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यादें

December 24, 2013

आज एक बचपन की दोस्त को टीवी पर देखा. दोस्त भी क्या कहूं , बचपन वाली बेस्ट फ्रेंड थी कभी .
गहरे दोस्त.
के जी से लेकर करीब पांचवी तक . बाहों में बाहें डालकर घूमना . एक दुसरे का टिफ़िन खाना. उसे अंडे बड़े पसन्द थे और आती थी शुद्ध ब्राह्मण परिवार से . मेरे टिफ़िन में मम्मी एक अंडा उसके लिए भी डाल  देती थीं . संभ्रांत परिवार था उसका  .

पिता उस समय सबसे बड़े हिंदी दैनिक के सम्पादक हुआ करते थे (शायद आज भी हों . मैं जानती नहीं ) माँ बड़ी सीधी -सादी महिला थीं . एक छोटी सी बहन भी थी जो मेरे छोटे  भाईयों से लड़ती रहती थी. बच्चों वाली मासूम लड़ाई . मेरा खिलौना – तेरा खिलौना  वाली .

जैसा कि लगभग सभी पुरानी पीढ़ियों के साथ था कि सभी कांग्रेसी रहे थे . हमारे- उसके शायद ज़्यादातर परिवारों की यही कहानी थी . फर्क ये था की आज भी  वे कट्टर कांग्रेसी थे  उसके माता पिता और वह   खुद भी . बचपन से ही. पुरानी पीढ़ियों की सोच को ही जस का तस अपना लिया गया था .

खैर कहानी यहाँ से शुरू हुई की वो  मेरे बचपन की दोस्त थी . ‘  अबे यार ‘  ‘क्या स्वाद बना है ‘ उसके प्यारे से तकिया कलाम थे मानो .

हमेशा घर चले आना और खूब खेलना . दोस्तों वाली प्रतिस्पर्धा भी थी .” तू फर्स्ट कैसे आयी? कॉपी दिखा. ”     ”देख मेरे कितने मार्क्स  आए.”

फर्स्ट , सेकंड का ज़िम्मा हम दोनों ने ही सम्भाल रखा था. कभी मैं, कभी वो.

जब मम्मी पापा हमें पड़ोस की दुकान तक भेजने से डरते थे तब वो  भागती भागती मुट्ठी में कुछ रुपये पकडे नुक्कड़ की  दुकान से टॉफीयां ले आती थी

स्कूल भी हमारा बड़ा ही प्यारा सा था . उसमे बड़े बिज़नस वालों  के बच्चे भी थे , हम जैसे मिडिल क्लास फौजी अफसर के बच्चे , मंदिर के पुजारी का बेटा, राष्ट्रीय दैनिक के सम्पादक के बच्चे और नाले के उस पार झोंपड़ी में रहनेवालों के बच्चे भी .

टीवी पर इस दोस्त को लम्बे समय से देखती आ रही थी . जब उसने छात्र राजनीति में कदम रखा ही था . जब वो युवा नेता थी दिल्ली की . आज प्रवक्ता है सबसे बड़ी पार्टी की . बहुत बुद्धिमान , बेहद खूबसूरत और ठहरी हुई सी . लगता तो ऐसा ही है.
अपनी इस सहेली से आज से करीब सात -आठ साल पहले मिली थी . तब भी हम शायद दस साल बाद ही मिल रहे थे .

कल टीवी पर देखते देखते यूँ ही मन हुआ की उसे ढूँढूँ और फिर वही हंसी सुनूँ.

एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर खोज शुरू की . पहले ही पेज पर वो दिखी . दुल्हन के लिबास में . बड़ी सुन्दर . बला की . फिर उत्सुकता हुई जानने की. शादी हुई तो कब ? किससे ? अंकल आंटी और छुटकी वह प्यारी सी तुतलाती सी बहन कहाँ है ? कई फ़ोटो देखे . आंटी अंकल वैसे ही हैं. बहन भी उतनी ही प्यारी है अब शायद जर्नलिज्म का कोर्स कर रही है .
आखिर में main पेज खोला . ठिठक सी गयी .

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के सर्वे सर्वा खड़े थे dulha दुल्हन के साथ . माँ – बेटा और सभी दिग्गज .
जाने क्या सोच कर फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी .

जाने किस बात का डर है.
शायद इस राजनीतिज्ञ में मुझे अपनी बचपन की सहेली ना मिले.
शायद उसे मैं याद ना हूँ .
और सबसे बड़ा डर शायद ये की इतनी करीबी दोस्ती सत्ताधारों से शायद मुझसे सम्भाले न सम्भले .

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5 Comments leave one →
  1. December 24, 2013 5:46 pm

    sach mein time ke saath dosti mein bhi kitne changes aa jate hain.. kaha woh hamari dosti n friends, jahan kabhi ye nahi socha ki agar maine ye boloungi toh use bura lagega, aaj wahin chhoti si baat kehne mein bhi jhijhak hoti hai… :(

    very well written!! :)
    me- Welcome here Neeli:) thanks a lot for the kind words. Yes, the comfort level disappears with time. But sometimes, if we are really lucky, a few friendships remain untouched.

  2. December 24, 2013 11:06 pm

    Ahoy Indyeah! How have you been? It has been a very long time :)
    me- been good:) yep its been really long. how has life been friend?:)

  3. December 31, 2013 1:11 am

    Indy!!! you started blogging again!! Wow! I saw someone sharing your blogpost on FB and I went.. Whoooo! how did I miss this ???? How have you been ? Did you know about the blogger’s meet we had ? Missed you there lady! Hope to meet you some day :)

    And keep blogging :) It is nice to see you blogging again!!

  4. January 7, 2014 4:49 pm

    What a lovely write-up Indyeah! I am embarrassed to admit that I had difficulty in reading this Hindi post and read it slowly, aloud, haltingly, and took 10 mins to complete.

    You’ve probably made two points (in my case) with this.

    Yes, some friendships can turn into an awkward, hesitant relationship. Maybe breaking the ice helps sometimes, but need the guts to face what’s on the other side.

    Meanwhile, hope lies in all those friendships when you return after years and just their first “Hello” tells you absolutely nothing has changed.

    I need to read Hindi more often.

    Hugs, may be some day the request can be sent. All in good time.

    Me- ((hugs)))for reading the entire article Crafty:) Even if haltingly. That touched me. Yes, maybe someday. Maybe:)

  5. viv permalink
    May 29, 2014 5:09 pm

    Ragini…..

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