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हर गम की अपनी एक दास्तां है

November 19, 2013

एक लड़की जो अब भी लड़की ही है, बड़ी ही कब हुई ?   पर अब माँ कुछ ज्यादा क्यूंकि जिससे वो  रूठती  मचलती थी वो अब नहीं है …..

अब उसकी दुनिया उसके बच्चे में सिमटी सी है  …..

अपने बच्चे के साथ कभी माँ कभी दोस्त …..पर उसकी  भी तो  एक अलग दुनिया होगी कभी ………फिर?

हमसफ़र को आँखें  अब भी तलाशती हैं ….एक गाना सुनकर धीरे से अपने आंसू पोंछना …कोई देख ना ले…..ऐसा हमसफ़र जिससे बेइंतहां प्यार था …

खुद एक नन्ही सी डरी  सी बच्ची ….कुछ गुनगुनाते हुए …..एक  पल के लिए ठिठक सी जाती हो  मानो …कभी एक तस्वीर दिखाती है….” ये V  हैं ”…….लगता है समेट लूं  और बचा लूं हर दर्द से …पर दर्द तो मिल चुका है…..इतनी बड़ी चोट ….जिसे यूँ पाया , संजोया और खो दिया ?

ऐसे पलों में मैं अपनी आँखें चुराती हूँ…क्या कहूं और कैसे….?

…घाव अब भी दर्द देता है…..कई पल…अनगिनत पल जब वो कुछ देखते देखते खो सी  जाती हैं …..ऐसे एक पल में आज लगा ….क्यूँ?  किसने लिखा इतना दर्द इनके लिए? क्यूँ?

भगवान्… ईश्वर इन शब्दों से विश्वास   उठ चुका है  ……

गम सभी एक से हों, ऐसा ज्ररुरी तो नही, ये मै जानती हूँ

हर गम की अपनी एक दास्तां है कुछ मुस्कुराएँ हैं अभी- अभी .. फिर चौंककर देखते हैं अपना अक्स आईने में

कुछ सॉस लेना भूल चुकें हैं बस जीए जा रहें हैं…   .

गम सभी एक से हों, ऐसा ज्ररुरी तो नही, ये मै जानती हूँ

हर गम की अपनी एक दास्तां है

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